कन्या भ्रूण-हत्या
समस्या और निवारण
है
* «भूमिका
हमारे देश में नारियों पर घोर अत्याचार और शोषण का सिलसिला ख़त्म |
होने का नाम नहीं ले रहा है। कन्या श्रूण-हत्या, दहेज प्रथा, शारीरिक वे
मानसिक प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, .नार्रियों का क्रय-विंक्रय, आदि कुछ ऐसे
ज्वलंत उदाहरण हैं, वरना अत्याचार व शोषण का सिलसिलां बहुत लम्बा है।
नारी का जीवन नरक बना हुआ है। नारी जाति पर होने वाले अत्याचार की
रोकथाम के सिलसिले में केन्द्रीय व राज्य सरकारें, विभिन्न एक्ट व कानून
व्यवस्था तथा न््यायपालिकाएं विवश नजर आती हैं। -
क़ुरआन की शिक्षा यह है कि एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या, पूरी
मानवता की हत्या है तथा एक इन्सान को कृत्ल होने से बचा लेना, पूरी
इन्सानियत को बचा लेने के बराबर है। सोचिए वह समाज कितना क्रूर व
निर्दयी है, जो एक अबोध बच्ची को उसकी मां के ही पेट में कत्ल कर
दे। आर्ज्रिर उसका दोष क्या है? उसे जीने का अधिकार, तो पैदा करने वाले
(ईश्वर) ने दिया है। मानव का इस अधिकार को छीनना ईश्वर से विद्रोह
करने जेसा है। आरिज़िर उस महिला कों हेयदृष्टि व तिरस्कार भरी नजरों से
क्यों देखा जाता है, जिसके गर्भ से कन्या जन्म लेती है, जबकि लड़का या
लड़की पैदा करना उसके वश (अधिकार) में नहीं है।.
कन्या भ्रूण-हत्या की रोकथाम के लिए शिक्षा, कानून व्यवस्था और
विभिन्न एक्ट तथा खुशहाली आदि क्यों विफल हैं; इस समस्या का ठोस हल
क्या है? यह पूरे समाज की जिम्मेदारी है कि इस पर सोच-विचार करें और
इसका हल तलाश करें। इस समस्या का एक हल आज से 400 वर्ष पहले
अरब देश में ईशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल०) ने ईश्वरीय मार्गदर्शन--के
आधार पर दिया था। अरब के कुछ क़बीले-जो बर्बर और निर्दयी थे, अपनी
नवजात बेटियों को पैदा होने के बाद जीवित गाड़ देते थे या दूसरे तरीकों----- --
से उनकी हत्या कर देते थे। ईशदूत हजूरत मुहम्मद (सल्ल०) ने उनके
अन्दर दृढ़ विश्वास पैदा किया कि हम सबको पैदा करने वाला एक ईश्वर
है। वह हर कमजोरी से पाक है। उसकी न कोई बीवी है, न.बच्चे हैं और,
न ही कोई परिवार है। हर जानदार को रोजी देने की जिम्मेदारी ईश्वर ने स्वयं
ली है। रोजी. के लिए कोशिश करने के बाद जिसको जितनी रोजी चाहिए,
वह उसको उतनी ही रोजी प्रदान करता है। इसलिए लडकियों को ग्रीबी के
डर से हत्या करना महापाप है। इस संसार में ऐसे महाप्राप करने वाले लोग
[िल्या ध्रूणहत्य [- -“ --+-----++-+ न]
- सांसारिक नियम और कानून से तो बच सकते हैं, लेकिन मरने के बाद
'पारलौकिक जीवन जो सदेव के लिए होगा, वहां ईश्वर की पेंकड और
उंसके दंड से बंच नहीं सकेंगे। अल्लाह पर ईमान औरं पंरलोक में पकड़े
जाने पंर यकीन होने का परिणाम यह निकला कि अरबं देश में पैदा होने
* के ब्राद लड़कियों |को जीवित गाड देने की प्रथा एकंदम संमाप्त हो गयी।
आजं ईशदूत हजरत मुंहम्मद (सलल०) के बाद 400 वर्ष बींत चुंके हैँ और
मुसलमानों में यंह समस्या न होने के बराबर है। हम॑ ईशदूंत हंजुरत मुहम्मद
(संल्ल०) के नियमों और शिक्षांओं से क्यों न लाभान्वितं हों। इन सारी बातों
'का विवरण आप सबको इस किताब के लेखों में मिंलेगा। अगर इंस
सामाजिंक, चारित्रिंक व इन्सांनी बीमारी को रोका न॑ गंया, तो संमोंज में
पारिवारिक व्यवस्था छिन््न-भिन्न हो जाएगी। पुरुष व॑ महिला की संख्या तथां
लिंग॑ संतुलंन का अनुपातं बिगंड जाएगा, जो कि प्राकृंतिक नियमों के विरुद्ध
है। क्या संसार में कोई समाज ऐसां कर्म करके बांकी रहे सकंता है? वह
अंपनी बहुत सारी तरविकलों। व उपलब्धियों के बावजूद भी तबाह व॑ बर्बाद
हो ज़ाएगा।
जमाअत इस्लामी हिन्द देश में 70 वर्षों से कार्यरत है। सामाजिक '
बुराइयों एवं चारित्रिक पतन को दूर करने के सिलसिंले में बह स्वयं भी
अपने नियम, सिद्धांत तथा पद्धतियों के तहत काम कर रंही है तंथा दूसरी
संस्थाओं से भी सहायतां लेती है. और सहायता देती है। जमाअत इस्लामी
हिंन्द के निकट कन्या भ्रूण-हत्यां और इसके जैसी दूसरी भयानक समस्याओं
के पैदा होने का वास्तंविक कारणं इन्सान का ईश्वरीयं मार्गदर्शन से दूर
होकर अपने बनाए हुएं नियमों पर चलना है। इसके अतिरिक्त एक मुख्य
कांरण मौत के बाद आंने वाली जिन्देगी में ईश्वर की ओर से कर्मों की
पूंछताछ, हिसाब-किताब॑ और--जंजा व सजा (प्रतिकार-दंड) के तसत्चुर
(धोरणा)- से आजाद होकर जीवन व्यतीत करना है।
यह पुस्तिका कन्यां भ्रूण-हत्या, संमस्या और निवारणं जैसे मुख्य विषय
परे कांफ्रेंस के शुभ अवसर पर आपकी सेवा में प्रस्तुत करते हुएं हमें अपार
हर्ष हो रहा है। ईश्वर, अल्लाह से प्रार्थना है कि इस भंयानक समस्या को
मिल-जुलंकर हल॑ कंरने में हमारी सहायता करे।
मुहम्भदं इकंबांल मुल्ला
सचिव, जमाअत इस्लामी 'हिन्दं,
नई दिल््ली-0025
मोबाइल ; 980032508
रन कन्या भ्रूण-हत्या
कन्या भ्रूण-हत्या
समस्या और निवारण
७ डॉ० रज़ीउल इस्लाम नद॒वी
कन्या भ्रूण-हत्या वर्तमान समय की गंभीर सामाजिक समस्याओं में से .
एक है, इसी कारण लिंग संतुलन बिगड़ रहा है। लड़कों की. संख्या अधिक
और लड॒कियों की कम होती जा रही है। इसके कारण समाज पर
अत्यधिक बुरे और खतरनाक प्रभाव पड़ रहे हैं। बुद्धिजीवी वर्ग चिंतित है
और इस बुराई से निबटने का उपाय सोच रहा है। सामाजिक संस्थाएं भी «
इसकी रोकथाम की कोशिश में हैं और जिसको जो समझ में आ रहा है, कर
रहा है। सरकारी स्तर पर भी इसकी रोकथाम के लिए कानून बनाये गये हैं।
इनमें कठोरतम सजाओं का प्रावधान है, लेकिन इस बुराई की समाप्ति के
कोई संकेत नजुर नहीं आ रहे हैं। ईश्वर की बनायी हुई प्राकृतिक व्यवस्था
में इंसानी हस्तक्षेप से पैदा होने वाली गड़बडियों और असंतुलन के परिणाम
को इन्सान झेलने के लिए विवश है।
पहले जनसंख्या की समस्या को हव्वा बनाकर पेश किया गया। इससे
'निबेटने के लिए “परिवार नियोजन” की तरह-तरह कौ स्कौमें बनायी गयीं। '
बर्थ कंट्रोल के कानून बने। मामला आगे बढ़ा, तो अब लिंग निर्धारण की
कोशिश की जाती है। विभिन्न उपकरणों की सहायता से यह पता लगाने की
कोशिश की जाती है कि भ्रूण जो मां के पेट में पल रहा है, उसका लिंग
कया है? यदि यह पता चल जाता है कि वह लड़की है, तो गर्भपात करा
दिया जाता है।
भारत में प्रति दस वर्ष पर जनगणना होती है। सन् 200 में देश की
आबादी एक अरब दो करोड सत्तर लाख पन्द्रह हजार (,02,70,5,000)
को पार कर गयी है। इनमें पुरुषों को संख्या 53,2,77,000 और महिलाओं
की संख्या 49,57,38,000 बतायी गयी है, अर्थात 00 पुरुषों को तुलना में
93 महिलाएं हैं। सन् 99। की जनगणना को तुलना में यह अंतर और भी
अधिक था। (राष्ट्रीय सहारा, 7 सितम्बर 2006)
देश के कई राज्यों में लड़कों और लड़कियों के बीच अनुपात में बहुत
कु ः
अंतर है। इनमें विशेष रूप से गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा,
दिल्ली और हिमाचल प्रदेश उल्लेखनीय हैं। इन राज्यों में ॥000 लड़कों की
तुलना में लड़कियों की संख्या 800-900 के बीच है। सन् 99। की
जनगणना में पंजाब में 000 लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या
875 थी, जो सन् 200। में घटकर 793 हो गयी! इसी तरह महाराष्ट्र में सन्
99। की जनगणना में 000 लड़कों को तुलना में लडकियों की संख्या
948 थी, जो सन् 200। में घटकर 97 हो गयी है।
(राष्ट्रीय सहारा, 22 अगस्त, 2006)
राजस्थान के सरहदी इलाके जैसलमेर की आबादी में 000 लड़कों की
तुलना में लड़कियों को संख्या केवल 785 है। |
हि (राष्ट्रीय सहारा, 9 सितम्बर, 2006)
आगरा डिवीजन में 000 लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या
फिरोजाबाद में 887, एटा में 89, आगरा में 866, मथुरा में 872, हाथरस
में 886 और अलीगढ़ में 885 है। * (राष्ट्रीय सहारा, 29 मई, 2006)
लड़कियों से छुटकारा पाने का यह रुझान समाज़ में लड़कियों को कम
हैसियत हासिल होने की वजह से है। उन्हें कह | की तुलना में कमतर
समझा जाता है। उनके अस्तित्व को माता-पिता ऊपर बोझ समझते हैं।
उनका लालन-पालन, उनकी सुरक्षा, उनके विवाह में होने वाली परेशानियां
आदि उनके लिए बोझ बन जाती हैं। इन सबके अतिरिक्त भी बच्चियों के
मामले में ऐसी नाजुक और संगीन समस्याएं सामने आती रहती हैं कि मां-
बाप इसी में भलाई समझता है कि जन्म से पहले ही उससे छुटकारा पा
लिया “जाए। *
जब अल्लाह के अन्तिम ईशदूत इस दुनिया में आये, उस समय भी ,
लड़कियों को भारी बोझ समझा जाता था। उनके माता-पिता को इस बात की
आशंका सदैव सताती रहती थी कि अच्छा रिश्ता न मिलने कौ स्थिति में
उन्हें अपनी बेटी की शादी दूसरे कृबीलों में करनी होगी। यह भी ख़तरा
रहता ' था कि लुटेरे जब आक्रमण करेंगे, तो वे उन्हें पकड़ ले जाएंगे और
उन्हें दासियां बना लेंगे। यही कारण था कि जब उनमें से किसी के यहां
लड़की पैदा होती थी, तो उसका चेहरा उतर जाता था।
“और जब उनमें से किसी को बेटी की शुभ सूचना मिलती है तो उसके
चेहरे पर कलौंस छा जाती है और वह घुटा-घुटा रहता है। जो शुभ सूचना
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उसे दी गयी वह (उसकी दृष्टि में) ऐसी बुराई की बात हुई कि उसके
कारण वह लोगों से छिपता-फिरता है कि अपमान सहन करके उसे रहने दे
या उसे मिट्टी में दबा दे। देखो कितना बुगा फैसला है जो वे करते हैं।'”
(कुरआन, ]6:58-59)
लडकियों से छुटकारा पाने के लिए इस्लाम के आगमन से पहले अरब
, के कुछ कुबीलों (]7968) में बड़ी घिनौनी-घिनौनी प्रथाएं थीं-
“जब जन्म का समय करीब आता, तो एक गढा खोद दिया जाता था।
फिर यदि लड़की पैदा होती, तो जन्म के तुरंत बाद उसे गढ्ढे में दपृन (गाड़)
कर दिया जाता था ।'! (इब्ने-अब्बास)
“लडकी पैदा होते ही उसे मारकर कुत्ते के आगे डाल दिया जाता था।"
(कृतादा)
(क) “किसी पहाड़ की चोटी पर ले जाकर फेंक दिया जाता था।
(ख) पानी में -डुबा दिया जाता था।
(ग) ज़िब्ह (वध) कर दिया जाता था।
(घ) जब वह कुछ बड़ी हो जाती थी, तो एक दिन उसे खूब सजा-
संवार कर रेगिस्तान में ले जाया जाता था, जहां ख़ूब गहरा गढा खोदकर उसमें
धकेल दिया जाता था और ऊपर से मिट्टी बराबर कर दी जाती थी।''
(तफूसीर कबीर)
आज की परिस्थितियां भी कुछ अलग नहीं हैं। जैसलमेर (राजस्थान)
के एक गांव 'देवड़ा' के बारे में एक, रिपोर्ट प्रकाशित हुई है कि वहां पिछले
00 वर्षों में किसी बच्ची की शादी नहीं हुई है। पैदा होते ही उन्हें मार दिया
जाता है। कभी-कभी तो यह काम ख़ुद उनकी मां करती है। वह अपने दूध
के साथ बच्ची को अफीम खिला देती है। नाक पर रेत की. पोटली रख देती
, है या मुंह और नाक में रेत भर देती है। मुंह पर रजाई या तकिया रख देती
है, ताकि बच्ची का दम घुट जाए, या मुंह में ममक भर देती है ।
(राष्ट्रीय सहारा, 9 सितम्बर, 2006)
समाज का वह वर्ग जो अपने को एडवांस मानता है, वह तो इतना
निर्दयी होता है कि शिशु के जन्म तक की भी प्रतीक्षा नहीं करता। गर्भ में
ही स्केनिंग करके पता लगा लिया जाता है कि गर्भ में पलने वाली नन्हीं-सी
जान लड़का है या लड़की। यदि लड़की हुई, तो गर्भपात करा दिया जाता
है। इस तरह भ्रूण-हत्या रोकने के लिए सन् 994 में कानून बनाया गया।
मन 3 मी अरिधियमधर मजाक मम 5
(86 ए8009/0 है रिव्शपॉधांणा 200 ?72पशा।07 ए.शीडप्र<४१ ९०)
. इंस कानून के तहत बच्चे के लिंग का पता लगाना कानूनी अपराध समझा
गया, लेकिन इसके बावजूद हर साल 5-7 लाख लडकियों की मां के गर्भ
में ही हत्या कर दी जाती है। (राष्ट्रीय सहारा, 6 जून, 2006) -
इंस तंरह के 7७॥॥9 007० पर समय-समय पर छापा भी मारा जाता .,
है। इस काम में लिप्त डॉक्टरों को गिरफ्तार भी किया जाता है, उनके विरुद्ध
मुकदमे भी चलते हैं और उन्हें सजा भी दी जाती है, मगर इन तमाम
कोशिशों के बावजूद इस सामाजिक बुराई क़ा ख़ात्मा. तो क्यो, इसके फ़ैलाब
को रोकना भी संभव नहीं हो सका है। '
इस्लामी उपाय ॥
इस्लाम भ्रूण-हत्या को गंभीर अपराध मानता |है। उसको रोकने के लिए
विभिन्न प्रकार की युक्तियां अपनाता है। जिन आशंकाओं और संभावित
* ख़तरों के कारण लोग 'भ्रूण-हत्या कर रहे हैं-उन्हें दूर करता है। इस्लाम
लड्कियों को सौभाग्यशालिनी व कल्याणकारिणी समझता है। उनके लालन-
पालन और अच्छे प्रशिक्षण क्री भी शिक्षा देता है। सामाजिक स्तर पर यह
बहुत ही लाभदायक सिद्ध हुआ है। ;
इस्लाम ने सबसे पहला काम यह किया कि लोगों को मानसिक रूप से
. इसके लिए तैयार किया। कोई भी कानून उस समय तक प्रभावशाली नहीं
हो सकता, जब तक- लोग उसे .मानने के लिए तैयार न हों। लोग उसकी
खूबियों से अवगत न हों और उसके न मांनने की हानियों की न जान जाएं।
इस्लाम ने बताया कि यह एक शैतानी कार्य है :
“इसी प्रकार बहुत से बहुदेववादियों के लिए
उनके साझीदारों ने उनकी अपनी संतान की हत्या को
सुहाना बना दिया है; ताकि उन्हें विनष्ट कर दें और
उनके लिए धर्म को संदिग्ध बना दें।'” (क्तुरआन, 6:37)
“वे लोग कुछ जाने-बूझे बिना घाटे में रहे
जिन्होंने मुर्खता के कारण अपनी संतान की हत्या
की।'! .. (क्ुरआन, 6:40)
अरब के कुछ कुबीले (]7068) अपनी लड़कियों की हत्या केवल'
इसलिए कर देते थे, कि वे उन्हें आर्थिक बोझ समझते थे। लड़के तो बड़े होकर
उनका हाथ बटाते थे, लेकिन लड़कियां बड़ी होकर कुछ नहीं करती थीं।
[ह]-----नपपपतत+त5+5++<८ |
कुरआन ने यह स्पष्ट किया कि आजिविका की चाबियां तो अल्लाह के
: हाथ में हैं। इस धरती पर जितने भी प्राणी हैं, उनकी रोजी का जिम्मा ईश्वर
ने अपने ऊपर ले रखा है। कोई शक्तिशाली हो या कमजोर, हट्टा-कट्य हो
या अपंग, स्वयं रोजी-रोटी के लिए दौड़-धूप करता हो या वह किसी दूसरे
चर निर्भर हो, उसे रोजी मिलती है, तो अल्लाह (ईश्वर) की आज्ञा और
उसकी मर्जी से ही :
“और निर्धनता के कारण अपनी संतान की हत्या
. न करो, हम तुम्हें भी रोजी देते हैं और उन्हें भी।''
* (क्तुरआन, 6:5])
“और निर्धनता के भय से अपनी संतान कीः हत्या
न करो, हम उन्हें भी रोजी देंगे और तुम्हें भी। वास्तव
में उनकी हत्या बहुत ही बड़ा अपराध है।''
रा (कुरआन, ]7:3)
लड़कियों की हत्या को उन घृणितर कृत्यों में शामिल किया गया है,
जिसके बारे में आर्ख्रितत (परलोक) के दिन पूछताछ होगी : ५
“और जब जीवित गाड़ी गई लड़की से पूछा
जाएगा कि उसकी हत्या किस गुनाह के कारण की
गई।'! (कुरआन, 8:8-9)
इस्लाम में लड़कियों क़ी हत्या की गिनती उन कामों में सम्मिलित की
गईं है, जिन्हें ईश्वर ने अवैध (हराम) करार दिया है :
“अल्लाह ने तुम पर हराम करार दिया है मां-बाप,
की अवज्ञा, लड़कियों को जिन्दा दफन करना और
फिज़जूलख़र्ची।'! (मुस्लिम) .
सन््तान की हत्या न करने की प्रतिज्ञा
ईशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल“)' अपने अनुयायियों से बेअत (प्रतिज्ञा).
लेते समय जिन बातों का इक्रार (वादा) करवाते थे, उनमें एक बात यह
भी होती थी कि अपनी संतान की हत्या नहीं करेंगे। 'हुदैविया की संधि' के
. बाद और मक्का-विजय से पहले बहुत-सी महिलाएं मक्का से हिजरत
3 न कनननथ-न ०233८
।.. (सल्ल०)-इसका पूर्ण रूप है, सल्लल्लाहु अलैहि वसललम, जिसका अर्थ है, अल्लाह
उन पर रहमत और सलामती को बारिश करे।
मा [हर]
(प्रवास) केरके मदीना पहुंचीं। ईश्वर ने अपने ईशदूत हजरत मुहम्मद
(सल्ल*०) को उनसे बैअत लेने का आदेश दिया ४
“ऐ नबी ! जब: तुम्हारे पास ईमानवाली स्त्रियां
» आकर तुमसे इस पर “बैअत' (प्रतिज्ञा) करें कि वे. -
' अल्लाह (ईश्वर ) के सांथ किसी चीज को साझी नहीं
ठहराएंगी और न चोरी करेंगी और न व्यभिचार
करेंगी, और न अपनी औलाद (संतान) को हत्या
करेंगी और न अपने' हाथों. और पैरों के -बीच' कोई
आरोप घड़कर लाएंगी, और न्..किसी भले काम में
तुम्हारी अवज्ञा करेंगी, तो उनसे “बैअत' ले लो और
उनके लिए अल्लाह से क्षमा की प्रार्थना करो। निश्चय
ही अल्लाह बहुत क्षमाशील, अत्यंत दयावान है ।
(कुरआन, 60:2)
इसी तरह की अहद (प्रतिज्ञा) ईशदूत ने मर्दों से भी लिया। मदीना
, “ हिजरत करने से पहले यसरिब के जिन खुशनसीब लोगों ने ईशदूत के हाथ
. पर 'बैअत' (प्रतिज्ञा) कौ थी उनमें हजरत उबादा बिन सामित (रजि०) भी
थे। वे बयान करते हैं "कि ईशदूत.हजूरत मुहम्मद (सल्ल०) ने फ्रमाया :
“मुझसे बैअत (प्रतिज्ञा) करो उस चीजू प्रर कि
अल्लाह के साथ किसी को शरीक नहीं ठहराओगे
चोरी नहीं करोगे, व्यभिचार नहीं करोगे और अपनी
संतान की हत्या नहीं करोगे।' (बुखारी)
इस्लाम इस बात को नहीं. मानता कि लड़की ;का अस्तित्व आदमी के
लिए मुसीबते या परेशानी का कारण है, बल्कि उसने लड़की को जन्नत '
(स्वर्ग) में प्रवेश करने का एक साधन बताया है।
हजरत इब्मे-अब्बास (रजिं>)! कहते हैं कि ईश्वर के दूत हजरत '
मुहम्मद (सल्ल०) ने फरमाया ही
.. “जिस व्यक्ति को दो लड़कियां हों, वह जब
त़क उनके पास रहें, वह उनके साथ अच्छा व्यवहार
करता रहे, तो वह उसके स्वर्ग में प्रवेश का साधन
बनेंगी ।/ - - - (सुनन इष्ने-माजा)
|. (रज़ि०)-इसका पूर्ण रूप है, रज़ियल्लाहु अन्हु, इसका अर्थ है, अल्लाह उनसे राजी हो।
[6]----------------+- - किये भ्रूणत्या
हजुरत उकृबा बिन आमिर (रजि०) कहते हैं, अल्लाह के रसूल
(सल्ल०) ने फूरमाया
“जिस व्यक्ति को तीन लड़कियां हों, वह सत्र
करे और उनको अपनी हैसियत के अनुसार खिलाये
पिलाये, पहनाये वह प्रलय के दिन नरक से उसके
लिए ओट बन जाएंगी।” (सुनन इब्ने-माजा)
हदीसों में लड़कियों की शिक्षा एवं प्रशिक्षण कौ बहुत ताकीद (ज़ोर
देकर) की गयी है | हजुरत अबू सईद अल-खुदरी (रजि०) से रिवायत
(उल्लिखित) है कि ईशदूत हजरत मुहम्मद (सल्ल०) ने फ्रमाया
““जिस व्यक्ति ने तीन्र-लड़कियों का लालन-पालन
उन्हें अदब (शिष्टता) सिखाया, उनकी शांदी की
और उनके साथ. सद्व्यवहार करता रहा, त्तो उसके
लिए स्वर्ग है ।” (अबू दाऊद) ह
हजरत इब्मे-अब्बास (रजि) से रिवायत है कि आप (सल्ल9 ने फरमाया :
“जिस व्यक्ति ने अपनी तीन बेटियों या तीन
बहनों का लालन-पालन किया, उन्हें अदब ( शिष्टता )
सिखाया, उनके साथ हमदर्दी ( सहानुभूति ) का मामला
किया, यहां तक कि ईश्वर ने उन्हें बेनियाज ( निःस्पूह )
कर दिया, उसके लिए अल्लाह ने स्वर्ग अनिवार्य कर
. दी है।
बयान करने वाले कहते हैं कि यह सुनकर एक व्यक्ति ने पूछा : ऐ,
ईश्वर के दूत! यदि किसी को दो बेटियां या दो बहनें हों और वह उनके
साथ ऐसा व्यवहार करे?” आप (सल्ल०) ने फरमाया : “उसके लिए भी .
यही बदला (प्रतिफल) है।”” ह
बयान करने वाला आगे कहता है कि यदि उपस्थित लोगों में से किसी
ने कोई एक लड्की या बहन के साथ सद्व्यवहार के बारे में पूछा होता, तो
ईशदूत यही जवाब देते। .' (शरह-अल-सुन्ना)
इस्लाम की ये शिक्षाएं लड़कियों को समाज में इतनी प्रतिष्ठा और
सम्मान प्रदान करती हैं कि इससे अधिक की कल्पना भी नहीं की जा
सकती। जिन समाजों में लड़कियों के अधिकार छीन लिए गये हैं, या उन्हें
'कमतर समझा जाता है, उन्हें उनकी हालत सुंधारने और उन्हें उच्च स्थान देने
के लिए इन शिक्षाओं से मदद मिलेगी।
कन्या प्रूणहत्या | --- ----------_--++-+“-++ 8]
कन्या भ्रूण-हत्या
७ मुहम्मद ज़ैनुलं आबिदीन मंसूरी ह
पाश्चात्य देशों की तरह, भारत भी नारी-अपमान, अत्याचार एवं शोषण
के अनेकानेक निन्दनीय कृत्यों से ग्रस्त है। उनमें सबसे दुखद “कन्या
भ्रूण-हत्या' से संबंधित अमानवीयता, अनैतिकता और क्रूरता की वर्तमान
स्थिति हमारे देश की ही 'विशेषता' है...उस देश की, जिसे एक धर्म प्रधान
देश, अहिंसा व आध्यात्मिकता का प्रेमी देश और नारी-गौरव-गरिमा का देश
होने पर गर्व है।
वैसे तो प्राचीन इतिहास में नारी पारिवारिक व सामाजिक जीवन में बहुत
.. निचली श्रेणी पर भी रखी गई नजर आती है, लेकिन ज्ञान-विज्ञान की उन्नति
तथा सभ्यता-संस्कृति की प्रगति से परिस्थिति में कुछ सुधार अवश्य आया
है, फिर भी अपमान, दुर्व्यवहार, अत्याचार और शोषण की कुछ नई व
आधुनिक दुष्परंपराओं और कुप्रथाओं का प्रचलन हमारी संवेदशशीलता को
खुलेआम चुनौती देने लगा है। साइंस व टेक्नॉलोजी ने कन्या-वध कौ सीमित
समस्या को, अल्ट्रासाउंड तकनीक: द्वारा भ्रूण-लिंग (70005 0०॥0७) की
जानकारी देकर, समाज में कन्या भ्रूण-हत्या को व्यापक बना दिया है। दुख
की बात है कि शिक्षित तथा आर्थिक स्तर पर सुखी-सम्पन्न वर्ग में यह
अतिनिन्दनीय काम अपनी जड़ें तेजी से फैलाता जा रहा है। *
इस व्यापक समस्या को रोकने के लिए गत कुछ वर्षों से कुछ चिंता
व्यक्त की जाने लगी है। साइन बोर्ड बनाने से लेकर कानून बनाने तक, कुछ
उपाय भी किए जाते रहे हैं। जहां तक कानून की बात है, विडम्बना यह है
कि अपराध तीब्र गति से आगे-आगे चलते हैं और कानून धीमी चाल से
काफी दूरी पर, पीछे-पीछे। नारी-आन्दोलन (फछगांग़ंओ ४०एश॥०ा॥) भी
रह-रहकर कुछ चिंता प्रदर्शित करता रहता है, यच्षि वह नाइट क्लब
कल्चर, सौंदर्य-प्रतियोगिता कल्चर, कैटवाक कल्चर, पब कल्चर, कॉल गर्ल
कल्चंर, वैलेन्याइन कल्चर आदि आधुनिकताओं (॥४०१६८४)५॥) तथा
अत्याधुनिकताओं (784-700०॥रंआए) की स्वतंत्रता, स्वेच्छंदता, विकास व
गा कन्या भूण-हत्या
उन्नति के लिए (मौलिक मानवाधिकार के हवाले से) जितना अधिक जोश,
तत्परता व तन््मयता दिखाता है, उसकी तुलना में कन्या भ्रूण-हत्या को रोकने
में बहुत कम तत्पर रहता है।
कुछ वर्ष पूर्व एक मुस्लिम सम्मेलन में (जिसका मूल-विषय 'मानव-
अधिकार' था) एक अखिल भारतीय प्रसिद्ध व प्रमुख एनग्जीग्ओ० की एक
राज्यीय (महिला) सचिव ने कहा था : “पुरुष-स्त्री अनुपात हमारे देश में
बहुत बिगड़ चुका है (000:840, से 000:970 तक) लेकिन इसको
तुलना में मुस्लिम समाज में यह अनुपात बहुत अच्छा, हर समाज से अच्छा
है। मुस्लिम समाज से अनुरोध है कि वह इस विषय में हमारे समाज और
देश का मार्गदर्शन और सहायता करें...।'
: उपरोक्त असंतुलित लिंग-अनुपात (0०70७ २७४०) के बारे में एक
पहलू तो यह है कि कथित महिला की जैसी चिंता, हमारे समाजशास्त्री वर्ग
के लोग आमतौर पर दर्शाते रहते हैं और दूसरा पहलू यह है कि जैसा कि
उपरोक्त महिला ने खासतौर पर जिक्र किया, हिन्दू समाज की तुलना में
मुस्लिम समाज की स्थिति काफी अच्छी है। इसके कारकों व कारणों की
समझ भी तुलनात्मक विवेचन से ही आ सकती है। मुस्लिम समाज में बहुएं
जलाई नहीं जातीं। “बलात्कार और उसके बाद हत्या' नहीं होती। लडकियां
अपने माता-पिता के सिर पर दहेज और ख़र्चीली शादी का पड़ा बोझ हटा
देने के लिए आत्महत्या नहीं करती। जिस पत्नी से निबाह न हो रहा हो
उससे 'छुटकारा' पाने के लिए 'हत्या' की जगह पर 'तलाक' का विकल्प
है और इन सबके अतिरिक्त, कन्या भ्रूण-हत्या की लानत मुस्लिम समाज
में नहीं है।
मुस्लिम समाज यद्यपि भारतीय मूल से ही उपजा, इसी का एक अंग है;
यहां की परंपराओं से सामीप्य और निरंतर मेल-जोल (]7678०॥०7) की
स्थिति में वह यहां के बहुत सारे सामाजिक रीति-रिवाज से प्रभावित रहा तथा
स्वयं को एक आदर्श इस्लामी समाज के रूप में पेश नहीं कर सका, बहुत
सारी कम्जोरियां उसमें भी घर कर गई हैं, फिर भी तुलनात्मक स्तर पर
उसमें जो सदगुण पाए जाते हैं, उनका कारण सिवाय इसके कुछ और नहीं
हो सकता, न हीं है, कि उसकी उठान एवं संरचना तथा उसकी संस्कृति को
उत्कृष्ट बनाने में इस्लाम ने एक प्रभावशाली भूमिका अदा की है।
इस्लाम, 400 वर्ष पूर्व जब अरब प्रायद्वीप (8४४ ऐ७75॥8) के
मरुस्थलीय क्षेत्र में एक असभ्य और अशिक्षित कौम के बीच आया, तो
अनैतिकता, चरित्रहीनता, अत्याचार, अन्याय, नग्नता व् अश्लीलता और नारी
अपमान और कन्या-वध के बहुत से रूप समाज में मौजूद थे। इस्लाम के
पैगम्बर का ईश्वरीय मिशन, ऐसा कोई “समाज सुधार-मिशन' न था जिसका
प्रभाव जीवन के कुछ पहलुओं पर कुछ मुद्दत के लिए पड़ जाता और फिर
पुरानी स्थिति वापस आ जाती। बल्कि आपका मिशन “सम्पूर्ण-परिवर्तन',
समग्र व स्थायी “क्रान्ति' था, इसलिए आप (सल्ल*०) ने मानव-जीवन की
समस्याओं को अलग-अलग हल करने का प्रयास नहीं किया बल्कि उस
मूल-बिन्दु से काम शुरू किया जहां समस्याओं का आधार होता है। इस्लाम
की दृष्टि में वह मूल बिन्दु समाज, कानून-व्यवस्था या प्रशासनिक व्यवस्था
नहीं बल्कि स्वयं “मनुष्य” है अर्थात् व्यक्ति का अंतःकरण, उसकी आत्मा,
उसकी प्रकृति व मनोवृत्ति, उसका स्वभाव, उसकी चेतना, उसकी मान्यताएं
व धारणाएं और उसकी सोच (४॥705७) तथा उसकी मानसिकता व
मनोप्रकृति (25५00089)।
इस्लाम की नीति यह है कि मनुष्य का सही और वास्तविक संबंध
डसके रचयिता, स्वामी, प्रभु से जितना कमजोर होगा समाज उतना ही बिगाड़ |
का शिकार होगा। 'अतएवं सबसे पहला कृदम इस्लाम ने यह उठाया कि
इन्सान के अन्दर एकेश्वरवाद का विश्वास और पारलौकिक जीवन में अच्छे
या बुरे कामों का तद्नुसार बदला (कर्मानुसार 'स्वर्ग' या 'नरक”) पाने का
विश्वास ख़ूब-खूब मजबूत कर दे। फिर अगला कृदम यह कि इसी विश्वास
के माध्यम से मनुष्य, समाज व सामूहिक व्यवस्था में अच्छाइयों के उत्थान
व स्थापना का, तथा बुराइयों के दमन व उन्मूलन का काम ले। इस्लाम की
पूरी जीवन-व्यवस्था इसी सिद्धांत पर संरचित होती है और इसी के माध्यम
से बदी व बुराई का निवारण भी होता है।
बेटियों की निर्मम हत्या की उपरोक्त कुप्रथा को ख़त्म करने के लिए
पैगुम्बर मुहम्मद (सल्ल०) ने अभियान छेड़ने, भाषण देने, आन्दोलन चलाने,
और “कानून-पुलिस-अदालत-जेल' का प्रकरण बनाने के बजाय केवल
इतना' कहा कि “जिस व्यक्ति के ततीन (या तीन से कम भी) बेटियां
हों, वह उन्हें जिन्दा गाड़कर उनकी हत्या कर दे, उन्हें सप्रेम व
स्नेहपूर्वक पाले-पोसे, उन्हें ( नेकी, शालीनता, सदाचरण ब ईशपरायणता
की ) उत्तम शिक्षा-दीक्षा दे, बेटों को उन पर प्रमुखता व वरीयता न दे
और अच्छा-सा ( नेक ) रिश्ता दूंढकर उनका घर बसा दे, तो पारलौकिक
जीवन में वह स्वर्ग में मेरे। साथ रहेगा। .
परलोकवाद' पर दृढ़ विश्वास बाले इन्सानों पर उपरोक्त संक्षिप्त-सी
: शिक्षा ने जादू का-सा असर किया। जिन लोगों के चेहरों पर बेटी पैदा होने
की ख़बर सुनकर कलौंस छा जाया करती थी (कुरआन, !6:58) उनके
: चेहरे अब.बेटी की पैदाइश पर, इस विश्वास से,,खिल उठने लगे कि उन्हें
.स्वर्ग-प्राप्ति का एक साधन मिल गया है। फिर बेटी अभिशाष नहीं, वरदान,
ख़ुदा की नेअमत, बरकत और सौभाग्यशाली भानी जाने लगी और् समाज
की, देखते-देखते काया पलट गई। ;
मनुष्य की कमजोरी है कि कभी कुछ काम लाभ की चाहत में करता
है और कंभी डर, भय से, और नुकसान से बचंने के लिए करता है। इन्सान
के रचयिता ईश्वर से अच्छा, भला इस मानव-प्रकृति को और कौन जान
सकता है? अत: इस पहलू से भी कन्या-वध करने वालों को अल्लाह
(ईश्वर) ने चेतावनी दीं। इस चेतावनी: की शैली बड़ी अजीब है जिसमें
अपराधी को नहीं, मारी गई बच्ची से संबोधन की बात कुरआन में आई है :
और जब (अर्थात् परलोक में हिसाब-कितांब,
फैसला और बदला मिलने के दिन) जिन्दा गाड़ी गईं
बच्ची से (ईश्वर द्वारा) पूछा जाएगा, कि वह किस
जुर्म में कृत्ल की गई थी' (8।:8,9)।
* इस वाक्य में, बेटियों को कृत्ल करने वालों को सख्त-चेतावनी दी गई
है और इसमें सर्वोच्च व सर्वसक्षम न््यायी 'ईश्वर' की अदालत से सख्त ,
सजा का फैसला दिया जाना निहित है। एकेश्वरवाद की धारणा तथा उसके
अंतर्गत परलोकवाद पर दृढ़ विश्वास का ही करिश्मा था कि मुस्लिम समाज
से कन्या-वध की लानत जड़, बुनियाद से उखड गई। 400 वर्षो से यही
धारणा, यही विश्वास मुस्लिम समाज में ख़ामोशी से अपना काम करता आ
रहा है और आज भी, भारत में मुस्लिम समाज “कन्या भ्रूण-हत्या' की लानत
से पाक, सर्वथा सुरक्षित है। देश को इस लानत से मुक्ति दिलाने के लिए
इस्लाम के स्थाई एवं प्रभावकारी विकल्प से उसको लाभांवित कराना समय
की एक बड़ी आवश्यकता है।
रोकिए, मादा भ्रूण हत्याएं.
७ विद्या प्रकाश
भ्रूण-हत्या, दहेज हत्या, सतीप्रथा, देवदासी प्रथा आदि विभिन्न स्वरूपों
में नारी उत्पीड्न का सिलसिला शिक्षा के बड़े पैमाने पर प्रचार-प्रसार के '
बावजूद जारी है। भ्रूण-हत्या के मध्यकालीन तरीकों का स्थान अब आधुनिक
चिकित्सा पद्धतियों तथा मेडिकल तकनीकों ने ले- लिया है। रा
नारी उत्पीड़न के विभिन्न रूप में भ्रूण-हत्या कम ख़तरनाक और
भयंकर नहीं है। प्रहले नवजात और अब अजन्मी बच्चियों को मौत के घाट
उतारां जा रहा. है। खुल्लम-खुल्ला अत्याधुनिक अल्ट्रासाइंड तकनीक के
, माध्यम से उनका लिंग-निर्धारण किया जा रहा है और थोड़े से पैसे के लिए
मां के गर्भाशय में पल रहें बालिका-भ्रूण को जन्म लेने से पहले ही मारा
, जा रहा है। इस सम्बन्ध में उपलब्ध आंकड़े इतने' खतरनाक और लोमहर्षक
हैं कि उन्हें सुनकर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति क़ौ अन्तरात्मा और हृदय.
. कांपे बगैर नहीं रहता। इस सम्बन्ध में सारे नियम-कामून छलावा मात्र बनकर
रह गए हैं।
इस सिलसिले में एक आकलन के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष एक लाख
से ज़्यादा महिलाएं गर्भ सम्बन्धी कारणों से अकाल मौत का शिकार होती हैं।
इनमें से. ग्यारह प्रतिशत महिलाओं की _मौत का कारण गर्भपात सम्बन्धी
जटिलताएं बताया जाता है। आज स्थिति यहां तक बन आई है कि बालिका
भ्रूण की हत्या ने भयावह सामाजिक एवं चिकित्सा सम्बन्धी समस्या का रूप
ले लिया है। इस सम्बन्ध में यह निश्चित तौर पर नहीं कहा और बताया जा
सकता कि कितनी महिलाओं के गर्भपात होते हैं और कितनी महिलाएं,
स्वेच्छा से अथवा अन्य किसी पारिवारिक या सामाजिक विवशता के कारण
गर्भपात का विकल्प चुनती हैं।
यह भी तयशुदा तौर पर दावा नहीं किया जा सकता कि ख़तरनाक
सह किस्म्र के गर्भपात के-दौरान कितनी महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना
पड़ता है, मगर हमारे देश में विभिन्न स्थानों एवं भूभागों में सारे क्षेत्रीय,
भाषाई और आर्थिक विषमताओं के बावजूद बालिका भ्रूण को हत्या के
कारण समान हैं और वे हैं-ख़ानदान को पुत्र की चाह, आर्थिक स्थिति
कमजोर होने के कारण लड़की पैदा होने पर दहेज की समस्या आदि।
इस सम्बन्ध में सरकार को भी कोई चिन्ता नहीं है। किसे इतनी फ़िक्र,
और फुरसत है, जो गर्भपात के आंकड़ों के गिरने या चढ़ने को लेकर नाहक्
(अकारण) अपनी नींद ख़राब करें। ऐसे में तथ्य सम्बन्धी केवल अनुमान
हो किए जा सकते हैं। इस बारे में जो आंकड़े और आकलन उपलब्ध हैं भी,
वे बहुत अधिक विश्वसनीय तथा वस्तुनिष्ठ नहीं कहे-माने जा सकते। एक
अनुमान के अनुसार स्वदेश में 5 लाख से दो करोड़ वार्षिक गर्भपात
कराया-किया जाता है तथा गर्भधारण की उम्र की प्रत्येक हजार महिलाओं
में से 260 से लेकर 450 तक महिलाएं विभिन्न कारणों से अपना गर्भपात
कराती हैं। फैमिली मेडिसिन इंडिया ने रामी छाबड़ा और नुना शील द्वारा वर्ष
994 के एक अध्ययन और आकलन के आधार पर जानकारी दी है.कि
वर्ष 992 में देश में कुल एक करोड़ 0 लाख गर्भपात हुए। यह बात कम
आश्चर्यजनक नहीं है कि देश में गर्भपात को वैधानिक मान्यता मिले 20 वर्ष
हो चुके हैं, लेकिन इनमें से केवल 6.6 प्रतिशत ही पंजीकृत गर्भपात
(एमन्टीन्पी०) थे।
एक आकलन के अनुसार वर्ष 99] से पंजीकृत गर्भपात की दर में
कोई परिवर्तन नहीं हुआ है । सन् 99। में पंजीकृत संस्थानों में कुल 6
लाख 36 हजार 456 गर्भपात हुए जबकि वर्ष 998-99 में यह संख्या 6
लाख 66 हजार 882 रही। ऐसा माना जाता है कि हर दर से बारह अवैध
गर्भपात पर एक एमश्टीग्पी० होता है। विश्व बैंक कीं 996 को रिपोर्ट के
अनुसार मौजूदा आधुनिक स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क में हर साल 50 लाख
गर्भपात अवैध ढंग से होते और कराए जाते हैं। आई“सी-एमन्आार० के वर्ष
989 के एक अध्ययन के अनुसार उस समय देश में 40 लाख असुरक्षित
गर्भपात हुए थे।
देश में सुलभ गर्भपात की सुविधा उपलब्ध होने के कारण से बालिका
भ्रूण के लिए जीवन असुरक्षित हो गया है। इन सबके पीछे परिवार में
पुत्र-प्राष्ति की प्रेरणा इस हद (सीमा) तक काम करती है कि स्वभावत:
धर्मभीरू और कानून का पालन करनेवाली महिलाएं भी कानून तोड़कर और
जीवन ख़तरे में डालकर गर्भपात के लिए रजामन्द हो जाया करती हैं! अंस्सी
के दशक के अन्त में देश में भ्रृंण के लिंग निर्धारण की आधुनिक तकनीक
लोकप्रिय होने लगी थी।
इस सम्बन्ध में उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार पुत्र प्राप्ति की कामना में
प्रतिवर्ष लगभग 40 लाख महिलाएं अपने जीवन का ख़तरा उठाकर अवैध
गर्भपात कराने पर आमादा (तैयार) होती है।-इंडियन मेडिकल एसोसिएशन
(आई-एम-ए०) के अनुसार यह संख्या 50 लाख का आंकड़ा पार कर चुकी
है। अखिल भारतीय जनसंख्या प्रभाग के अनुसार प्रसव के पूर्व मौत के घाट
उतारी जाने वाली बालिकाओं की संख्या: चार से पांच करोड़ के बीच बताई
गई है। अगर सरकारी आंकड़ों पर विश्वास किया जाए, तो पूरे देश में कुल
07 बालिका भ्रूणों की ही हत्या हुई। कितने हास्यास्पद हैं ये सरकारी
आंकड़े ?
सामान्यतः गर्भपात का निर्णय महिला का नहीं होता। विशेष रूप से दहेज '
की कुप्रथा, पारिवारिक और आर्थिक कारण उसे इस अपराध के लिए प्रेरित
करते हैं। स्थिति तब और भी गंभीर तथा ख़तरनाक हो जाया करती है, जब
अर्थोभाव तथा गरीबी की वजह से महिलाएं बालिका भ्रूण की हत्या के लिए
झोलाछाप डॉक्टरों कौ सहायता लेती हैं, जो कभी-कभी जानलेवा सिद्ध होती
है। बरसाती कुकुरमुत्तों की भांति विभिन्न नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में
स्थापित नर्सिंग होमों और जच्चा-बच्चा केन्द्रों (प्रसूतिगृहों) में भी यह काम
चोरी-छिपे तौर पर अच्छी रकृम लेकर किया जाता..है।
इस प्रकार के घिनौनी कृत्य केवल कानून बनाने से नहीं रुक सकता।
इसके लिए सामाजिक चेतनां जायृत करने कौ आवश्यकता है। इसके लिए
महिला संगठनों को भी आगे आना होगा। इसके अतिरिक्त सरकार को भी
यह जिम्मेदारी है कि वह एमब्टीव्पी० एक्ट को कड़ाई से लागू करे, नर्सिंग
होमों तथा अल्ट्रासाउंड मशीनों का पंजीकरण करे, वर्ष 994 के पी०एनग्डीण्टी०
एक्ट का उल्लंघन करनेवाले चिकित्सकों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई
की जाए तथा सब्ोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार अल्ट्रासाउंड क्लीनिकों और
गर्भपात केन्द्रों पर कड़ी निगरानी रखी जाए।
[[8 | -----ककजलनजऊजनपन+प+प+7८+5 --किन्या घूण-हत्या]
कब रुकेंगी भ्रूणं हत्याएं
७ मुहम्यद यूसुफ मुना' ।ै।
वास्तव में भ्रूण-हत्या, मानव हत्या है। यह जघन्य अपराध जितनी तेजी
से समाज में फैल रहा है, इससे समाज कलंकित होने के साथ-साथ नैतिक
गिरावट का भी शिकार हुआ है। इस घृणित अपराध ने जहां जीवन के
अधिकारों का अतिक्रमण किया है, वहीं न जाने कितने जीवनों को जन्म से
पूर्व असमय ही निगल लिया है। इस कुकृत्य में मानव को जीवन देने वाले
डॉक्टरों की अच्छी-ख़ासी संख्या लिप्त है, जिनके हाथों प्रतिदिन अबोध
अविकसित मानव जीवन दम तोड़ रहा है। इस पूरे मामले में सबसे दुख की
बात यह है कि ममता की प्रतिमूर्ति कही जाने वाली महिलाएं भी इसमें स्वयं
लिप्त हैं|
समाज में फैल रहे इस घिनौने अपराध के पीछे कुछ ऐसे सामाजिक दोष
हैं, जो दुष्कृति को बढ़ावा दिये हुए हैं। इन्हीं सामाजिक दोषों के कारण बहुत
बार न चाहते हुए भी महिलाएं भ्रूण-हत्या के लिए विवश होती हैं, क्योंकि
अच्छे या बुरे कर्मों के पीछे कुछ हद तक समाज भी जिम्मेदार होता है|
स्पष्ट है कि जब तक समाज में लड़के और लड़की में भेद, दहेज प्रथा,
जनसंख्या नियंत्रण, धार्मिक रूढिवाद, धन का लोभ आदि रहेगा, भ्रूण-हत्या
पर कृाबू पाना कठिन होगा। भ्रूण-हत्या के मामले में जो बातें पायी जाती हैं
वह यह कि नर की अपेक्षा मादा भ्रूण की हत्या बहुत अधिक होती है।
आइए, भ्रूण-हत्या के कारणों पर एक नजर डालें।
समाज में जब से जनसंख्या नियंत्रण के अभियान ने जोर पकड़ा है,
लोगों में छोटा परिवार सुखी परिवार का संदेश गया है और सीमित बच्चों का
परिवार फैशन बना है, भ्रूण-हत्या में तेजी आई है। जनसंख्या पर नियंत्रण के
लिए अपनाए जाने वाले साधनों में भ्रूण-हत्या को भी शामिल कर लिया गया
है। जनसंख्या नियंत्रण के.राग और छोटा परिवार रखने के फैशन ने लोगों
को भ्रूण-हत्या के लिए उकसाने का काम किया है।
भारतीय समाज में इस तरह की हत्याओं का प्रचलन बहुत पुराना है।
लिंग परीक्षण की आधुनिक मशीनों के आगमन से पूर्व भी लड़की पैदा होने
पर प्राचीन रूढ़ियों के चलते उसकी हत्या कर दी जाती थी। आज भी लिंग
कन्या प्रणहत्या ------+_-+ ऊ_क्--क्च्न्वनियापएण रन
भेद के चलते हत्या की जाती है। बस हत्या के कारण और रूप बदल गए
हैं। आज भी लड़कों की अपेक्षा लड़कियों की भ्रूण में हत्या की संख्या बहुत
अधिक है। लड़कियों की भ्रूण-हत्या के पीछे समाज में फैले दहेज रूपी
दानव की भी भूमिका रही ,है। गर्भ में हत्या के अलावा ससुराल में दहेज
के लिए हत्या, प्रताड़ना के कारण आत्महत्या आदि घटनाओं में चिंताजनक
हद तक बढोत्तरी हुई है।
मादा भ्रूण-हत्या के कारण लिंगीय संतुलन बिगड़ रहा है और दोनों के
अनुपात में अन्तर आ रहा है। कुछ राज्यों में तो यह असंतुलन चिंताजनक
स्थिति तक पहुंच गया है।
समाज में लड़के-लड़कियों में तेजी से फैल रहे भेदभाव .के कारण भी
मादा -भ्रूण-हत्या में वृद्धि हुई है। लड़के के सम्बन्ध में जहां सकारात्मक
धारणा यह-पाई जाती है कि वह घर की आर्थिक सहायता करेगा, माता-पिता
का सहारा बनेगा, उनकी सेवा करेगा। वहीं लड़की के बारे में यह सोच पाई
जाती है कि वह पराई अमानत (धरोहर) है, न तो वह मां-बाप की सेवा
करेगी, न ही उनका सहारा बनेगी,.उलटे वह परिवार पर बोझ है। ऐसे
सोच-विचार के कारण लोगों में पुत्र मोह अधिक पनपता है और लड़कियों
के प्रति उपेक्षाभाव। इस तरह को सशक्त धारणा उस समय महसूस होती है
जब ख़बर मिलती है कि पुत्र की चाह में किसी बच्चे की बलि चढ़ा दी
गई। ऐसी घटनाएं प्रायः सामने आती रहती हैं।
बढ़ती महंगाई ने भी भ्रूण-हत्या को प्रोत्साहन देने का काम किया है।-
गरीब परिवारों में बच्चों की परवरिश पर होने वाले ख़र्च के डर से उनकी
भ्रूण-हत्या कर दी जाती हैं। ऐसे गूरीब परिवारों के मनमस्तिष्क में यह बात.
बैठा दी गई है कि अधिक बच्चे विकास के मार्ग में बाधक हैं, जबकि इस
तरह के तर्क, सोच और विचार पूरी तरह से अप्राकृतिक व असामाजिक हैं।
यदि बड़ा परिवार गरीबी का कारण बनता, तो आज देश के प्रमुख उद्योगपति
व व्यापारी गूरीब हो चुके होते।
* समाज में बढ़ रही भ्रूण-हत्या की घटनाएं उसकी नैतिक गिरावट की
सूचक हैं। वर्तमान के भोगवादी संस्कृति ने आग "में घी डालने का काम
किया है। समाज में जिस तरह खुलापन आया है, उसने लोगों को निर्लज्ज
बनाने के साथ-साथ संवेदनहीन भी बनाया है। इस खुलेपन व भोगवादी
[ ठ0 [- जै-+--+--+-------- +-+-+ ++ ++ -- -- न कन्या भ्रूण-हत्या
संस्कृति ने अंबैध सम्बन्धों को पशुता की हद तक पहुंचा दिया है। इस दिशा
में अवैध संबंधों व अवैध भ्रूण-हत्या को बढ़ावा दिया है। यह संख्या बहुत
अधिक है। चूंकि ऐसे मामले इतने गुप्त होते हैं कि उनकी सही संख्यों का
पता नहीं चल पाता।
भ्रूण-हत्या के सम्बन्ध में सबसे घिनौंना रोल डॉक्टरों का रहा है। बहुत
से डॉक्टरों ने तो इसको अपना धंधा बना लिया। छोटे-छोटे स्थानों पर खुलने
वाले क्लीनिक जिनकी ओर मरीज कम आकर्षित होते हैं, वे अवैध भ्रूण की
हत्या का पेशा अपना लेते हैं। नब्बे के दशक के आरंभ में जयपुर में एक
निजी क्लीनिक ने 'एमनियोसेटेंसस' तकनीक से गर्भ में लिंग परीक्षण की
शुरुआत की थी। जिस पर जयपुर के कुछ डॉक्टरों ने आरोप लगाया था कि
इस क्लीनिक में प्रतिदिन औसतन 0 भ्रूण-हत्याएं होती हैं। उस समंय यहां
भ्रूण लिंग परीक्षण के 400 रुपये, भ्रूण-हत्या के 200 रुपये अर्थात् कुल
2600 रुपये बसूले जाते थे।
देश की राजधानी कही जाने वाली दिल्ली, उत्तर प्रदेश के कानपुर,
लखनऊ जैसे महानगरों तथा देश के अनेक शहरों में यह धंधा जोरों से चल
रहा है। एक आंकड़े के अनुसार सन् 978 से 983 तक पूरे देश में
लगभग 78,000 मादा भ्रूणों की हत्या की गई थी। इस समय पूरे देश में
लगभग प्रतिवर्ष 8560 भ्रूण-हत्याएं हो रही हैं।
चिकित्सा के क्षेत्र में जब से सोनोग्राफी, अल्ट्रासाउंड आया है, तब से
यह काम और अधिक तेज हो गया है। बहुत बार तो मात्र पैसे के' लिए
डॉक्टर नर भ्रूण को मादा बताकर उसकी हत्या कर देते हैं। जबकि सरकार
ने भ्रूण-हत्या को रोकने के लिए “लिंग परीक्षण प्रतिरोधी कानून'” बना.रखे
हैं, फिर भी लिंग परीक्षण जारी है!
चिकित्सा विज्ञान का इस दुष्कृत्य के लिए लगातार दुरुपयोग हो रहा है।
अब तो भ्रूण की हत्या के लिए इसको “क्रश' करने के अतिरिक्त इसमें
“एमक्रेडिल' नामक दवा डाल दी जाती है, जिससे भ्रूण अपने आप बाहर
निकल आता है। अल्ट्रा-सोनोग्राफी से लिंग परीक्षण तभी हो सकता है, जब
गर्भ तीन से चार महीने का हो जाता है।
इसके बाद ही भ्रूण-हत्या संभव है। भ्रूण का लिंगीय परीक्षण गूलत भी
हो सकता है। इस सम्बन्ध में डॉक्टरों का कहना है कि कोई भी टेस्ट सौ
प्रतिशत सही नहीं हो सकता है।
कन्या बूणहत्या-- -- “7 --------------------+--- रन]
सरकार के पास पर्याप्त कानून होने के बाद भी पूरे देश में बड़ी संख्या
में भ्रूण-हत्याएं हो रही हैं। इस सम्बन्ध में पहले सरकार के पास भारतीय
दंड संहिता (आईग्पीग्सी०) के अतिरिक्त और कोई कानून नहीं था, पर अब
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिगनेंसी एक्ट (एन्पीग्टीग) के अतिरिक्त राज्य
सरकारों ने भी पर्याप्त कानून बना रखे हैं।
इस सम्बन्ध में सरकार की उदासीनता संदेहात्मक है। इस उदासीनता के
पीछे कहीं सरकार की मुख्य सोच जनसंख्या नियंत्रण तो नहीं है? कहीं
सरकार यह तो नहीं चाहती कि इसी बहाने कम से कम जनसंख्या वृद्धि में
कुछ कमी बनी रहे !
संमाज में जारी भ्रूण-हत्या से यह तो स्पष्ट है कि व्यवस्था में कहीं न
कहीं कमी जुरूर है। चाहे वह जान-बूझकर हो या अनजाने में, पर यह कमी
समाज के लिए बहुत घातक है। यह बात सर्वविदित है कि मादा भ्रूण को -
हत्या बड़े पैमाने पर हो रही है। साथ ही प्रतिवर्ष लगभग 25,000 महिलाएं
अन्य कारणों से काल का ग्रास बन रही हैं। इससे जाहिर होता है कि
भ्रूण-हत्या का आरोप एक पक्षीय होता जा रहा है। वैसे भी भ्रूण-हत्या कराने
वालों में सबसे बड़ी संख्या उन लोगों की है, जो दहेज से -बचने के लिए
मादा भ्रूण की हत्या कराते.हैं या लोकलाज के भय से अवैध भ्रूण की।
. यदि एकपक्षीय हो रही भ्रूण-हंत्या को समय रहते रोका न गया, तो
समाज में एक ऐसा शून्य पैदा हो जाएगा, जिसको भर पाना आसान नहीं
« होगा।
सरकार को चाहिए कि वह मात्र भ्रूण-हत्या निरोधक कानून न॑ बनाएं,
बल्कि भ्रूण-हत्या के लिए उक्साने व विवश करने वाले सामाजिक दोषों पर
अंकुश लगाएं। दहेज प्रथा, अश्लीलता, सामाजिक खुलापन व अवैध सम्बन्धों
को रोकने के लिए कठोर कृदम उठाए।
समाज के जागरूक व प्रबुद्ध वर्ग को भी इस दिशा में आगे आना होगा,
ताकि समाज में व्याप्त रूढिवादी परम्पराओं दोषों व कमियों को समाप्त
किया जा सके। महिलाओं को इस सम्बन्ध में विशेष रूप से आगे आना होगा
तथा जागृति लानी होगी, क्योंकि भ्रूण-हत्या का समाज से समाप्त होना या
समाज में व्याप्त होना दोनों ही उनकी सोच, आचार-विचार पर मुख्य रूप
से निर्भर करता है।
22 |+-----------------+-- किया ध्रूण-हत्या
बच्ची की लाश और कुत्ता
. . ७ डॉ मुहम्मद अहमद, संपादक, कान्ति
जी हां, यह हृदयविदारक दृश्य चाय पी रहे लोगों ने देखा, जिसने उन्हें
स्तब्ध ही नहीं अन्दर से हिला दिया। सहसा वे यकीन नहीं कर सके कि
कुत्ते के मुंह में जो कुछ है, वह एक नवजात बच्ची की लाश है। यह दृश्य
कुरुक्षेत्र बस अड्डे के निकट स्थित ज्योतिसर टूरिस्ट कामप्लेक्स के ठीक
सामने का है, जहां लगे कूड़े के ढेर से कुत्ते ने शव को अपने जबड़ों में
दुबोचा। यह ज्योतिसर वही स्थल है, जिस़के बारे में गीता कौ जन्मस्थली होने
का दावा किया जाता है। पुलिस को सूचित करने पर उपाधीक्षक कमलदीप'
मौके पर पहुंचे और सामान्य प्रक्रिया (2) के तहत अपनी कार्रवाई शुरू कर
दी।
'दैनिक भास्कर! (8 मार्च 2009, हिसार- संस्करण) के अनुसार,
बताया जाता है कि बच्ची होने के कारण उसे मृत्यु का दंश झेलना पड़ा,
वह भी अत्यंत नृशंस और निर्मम। कहां गई मां की ममता? माता-पिता का
संतान के प्रति सहज-स्वाभाविक लगाव, वात्सल्य का जनाजा किसने निकाल
दिया? कितना बर्बर हो गया है भौतिकवादी समाज? कन्या भ्रूण-हत्या के '
आंकड़े बार-बार सामने आते हैं जो समाज की क्रूरता बताते हैं। कुछ पिताओं
के कर्तव्य पर भी सवालिया निशान लग रहे हैं। लड़कियों की लगातार घटती
संख्या को सामने लाते हैं, मगरं न मीडिया में कोई बहस छिड़ती है और न
ही समाज के कर्णधार उद्देलित होते हैं मानो सब गूंगे, बहरे, अंधे हो गए हों।
उन्हें तो लगता है कि नकारात्मक मुद्दों से मोह है और ये ऐसे इन्सान हैं,
जिन्हें इन्सानों से ही वेर है।
जो आंकड़े प्रकाशित-प्रसारित होते हैं, उनसे पता चलता है कि
पंजाब-हरियाणा क्षेत्र ऐसा है जहां कन्या भ्रूण-हत्या के मामले सर्वाधिक हैं
जिसके नतीजे में स्त्री-पुरुष अनुपात में स्त्रियों की संख्या चिन्ताजनक स्थिति
तक घट गई है। अभी पिछले वर्ष हरियाणा के एक गांव में मुद्तों बाद एक
कन्या अ्रूण-हत्या |- --------+-“-+-+“- द्ापनिपनात-दजऊू-प न 23
ऐसी लड़की पैदा हुई, जो जीवित थी, अत: ख़बर बन गई। यह ऐसा गांव .
रहा है कि जहां बच्ची को जीवित नहीं रखा जाता था। लोग बच्ची रखना
अपना और अपने खानदान का अपमान समझते थे और किसी को दामाद
बनाना इतना असहय था मानो उनकी नाक कट गई हो। अरब में हजरत
मुहम्मद (सलल०) के आगमन से पूर्व ज्ञानाभाव काल में लगभग यही स्थिति
थी। इस्लाम ने इस विषम स्थिति को एकदम बदल दिया और बच्चियों का
ठीक से पालन-पोषण होने लगा और उनको यथोचित सम्मान मिलने लगा।
इस्लाम की शिक्षाओं में महिलाओं की प्रतिष्ठा व सम्मान एक उल्लेखनीय
स्थान रखतां है।
पवित्र कुरआन मानवता के नाम ईश्वर का सन्देश और निर्देश है। इसकी
8]वीं सूरह (अध्याय) में भी कियामत (प्रलय) का दृश्य पेश किया गया
है। इस दिन जो सवाल पूछे जाएंगे, उनमें यह भी होगा-'“जब जीवित गाड़ी
हुई लड़की से पूछा जाएगा कि उसकी हत्या किस गुनाह के कारण की
गई?'' अत-तकवीर : 8,9)! जगत-उद्धारक हजरत मुहम्मद (सल्ल०) ने
फुरमाया, “तुममें से जिसके तीन लड़कियां या तीन बहनें हों और वह उनके :
साथ अच्छा व्यवहार करे, तो वह जन्नत में अनिवार्यतः प्रवेश पाएगा''
(तिरमिजी)। :
हि कया चूस क्या